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Tuesday, June 7, 2011

पान मसाला बताकर हो रहा गुटखे का विज्ञापन

खुशबू(ख़ुशी)इन्द्री :
मुंबई सहित देश भर में तंबाकू उत्पाद निषेध अधिनियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। महानगर में पान मसाला विज्ञापन के रूप में तम्बाकू उत्पादों का धड़ल्ले से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। संगठन ने मुम्बई महानगर के तीन हजार लोगों के बीच यह सर्वेक्षण किया था। इसमें अधिकतर उत्तरदाताओं ने पान मसाला विज्ञापन को गुटखा का प्रचार बताया है। ऐसी स्थिति में यह सिगरेट व अन्य तंबाकू उत्पाद (उत्पादन, आपूर्ति, वितरण, व्यापार एवं वाणिज्य के विनियमन और विज्ञापन का निषेध) अधिनियम-2003 का उल्लंघन करता है। सर्वेक्षण के लिए दो समूहों का चयन किया गया था। एक समूह ने 12-18 वर्ष के आयु वर्ग (बच्चे) की प्रतिक्रिया ली और दूसरे समूह ने 19-50 वर्ष के आयुवर्ग (युवा) की। सर्वेक्षणकर्ताओं ने उत्तरदाताओं को तीन ब्रांडों वाले पान मसाला विज्ञापनों के फ्लैश कार्ड दिखाए जो होर्डिग और बेस्ट बसों पर दिखाई देते हैं। पहले फ्लैश कार्ड के उत्तरदाताओं में 82 फीसदी (1235) बच्चों और 84 फीसदी (1255) युवाओं ने इसे गुटखा बताया, जबकि 9 फीसदी (136) बच्चों और 7 फीसदी (105) युवाओं ने कहा कि यह पान मसाला है। दूसरे फ्लैश कार्ड के उत्तरदाताओं में 62 फीसदी बच्चों और 71 फीसदी युवाओं ने इसे गुटखा बताया, जबकि 14 फीसदी बच्चों और 13 फीसदी युवाओं ने इसे पान मसाला करार दिया। इसी प्रकार तीसरे फ्लैश कार्ड के उत्तरदाताओं में 58 फीसदी बच्चों और 65 फीसदी युवाओं ने इसे गुटखा कहा, जबकि 17 फीसदी बच्चों और 15 फीसदी युवाओं ने इसे पान मसाला बताया। सलाम बॉम्बे की कार्यक्रम निदेशक देविका चड्ढा ने कहा, सभी तीन ब्रांडों ने पान मसाला उत्पाद का विज्ञापन करने का दावा किया है। जबकि अध्ययन में सामने आया है कि विज्ञापन अप्रत्यक्ष रूप से उनके गुटखा का प्रचार-प्रसार करते हैं क्योंकि विज्ञापन देखने वालों ने इसे गुटखा का प्रचार बताया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विज्ञापन उत्पादों को खरीदने में उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। संगठन ने भारतीय विज्ञापन परिषद (एसीआइ) को पत्र लिखकर ऐसे ब्रांडों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है जो अप्रत्यक्ष रूप से तंबाकू उत्पादों का प्रचार-प्रसार कर उत्पाद निषेध अधिनियम का उल्लंघन करते हैं।


Monday, June 6, 2011

देश के धनी भी नहीं चाहते घर की लक्ष्मी


खुशबू(ख़ुशी)इन्द्री :
एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि संतान के रूप में एक कन्या होने के बाद यदि गर्भ में दूसरी भी लड़की आ जाती है तो ऐसे भ्रूण की हत्या करवाने की प्रवृत्ति भारत में धनी एवं शिक्षित तबकों में तेजी से बढ़ रही है। प्रतिष्ठित लैंसेट पत्रिका के आगामी अंक में छपने वाले इस अध्ययन के निष्कर्षो के अनुसार 1980 से 2010 के बीच इस तरह के गर्भपातों की संख्या 42 लाख से एक करोड़ 21 लाख के बीच रही है। अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले कुछ दशकों में पुत्र की चाहत में चुनिंदा गर्भपात का चलन बढ़ा है। साथ ही लड़के-लड़कियों के अनुपात में कमी की प्रवृत्ति जो अभी तक उत्तरी राज्यों में ही ज्यादा पाई जाती थी अब उसका प्रकोप पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में भी फैलने लगा है। टोरंटो विश्वविद्यालय के प्रभात झा इस अध्ययन पत्र के मुख्य लेखक हैं। उन्होंने बताया, भारत की अधिकतर आबादी ऐसे राज्यों में रहती है जहां इस तरह के मामले आम हैं। अध्ययन में जनगणना आंकड़ों और राष्ट्रीय सर्वेक्षण के जन्म आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस विश्लेषण का मकसद ऐसे परिवारों में दूसरे बच्चे के जन्म में बालक-बालिका के अनुपात का अंदाजा लगाया जा सका जहां पहली संतान के रूप में बच्ची पैदा हो चुकी थी। अध्ययन में पाया गया कि 1990 में प्रति 1000 लड़कों पर 906 लड़कियां थीं जो 2005 में घटकर 836 रह गई। झा ने कहा कि अनुपात में यह गिरावट उन परिवारों में अधिक देखी गई जहां जन्म देने वाली मां ने दसवीं या उससे उच्च कक्षा की शिक्षा हासिल कर रखी थी और जो संपन्न गृहस्थी की थी। लेकिन ऐसे ही परिवारों में यदि पहला बच्चा लड़का है तो दूसरी संतान के मामले में लड़का-लड़की अनुपात में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने कहा कि इससे यह सुझाव मिलता है कि कन्या भ्रूण का चुनिंदा गर्भपात शिक्षित एवं संपन्न परिवारों में ज्यादा मिलता है। ऐसी प्रवृत्ति आम तौर पर पहली संतान के लड़की होने के मामलों में देखी जाती है। 1980 के दशक में कन्या भ्रूण का चुनिंदा गर्भपात 0.20 लाख था, जो 1990 के दशक में बढ़कर 12 लाख से 40 लाख तथा 2000 के दशक में 31 लाख से 60 लाख तक हो गया।
अमेरिका में भी भारतीय मूल की महिलाएं आगे : भारत ही नहीं अमेरिका में भी भारतीय मूल की महिलाएं पुत्र की चाह में खूब कन्या भू्रण हत्या करवा रही हैं। खास बात यह है कि भारत के विपरीत अमेरिका में लिंग निर्धारण करवाना कानूनन वैध है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने सितंबर 2004 से दिसंबर 2009 के बीच लिंग निर्धारण परीक्षण करवाने वाली कैलिफोर्निया, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क की प्रवासी भारतीय महिलाओं का साक्षात्कार किया। शोध में यह बात सामने आई कि 40 प्रतिशत महिलाओं ने यह जानने के बाद कि उनके गर्भ में कन्या पल रही है, गर्भपात करवा दिया। साक्षात्कार के दौरान जो महिलाएं गर्भवती थीं, उनमें से 89 प्रतिशत ने कन्या भू्रण हत्या करवाई। शोध में यह बात सामने आई कि जिन महिलाओं ने यह जानने के बावजूद उसे जन्म दिया कि उनके पेट में कन्या भ्रूण है, उन्हें गर्भावस्था के दौरान कई तरह के मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से गुजरना पड़ा|

भारत 20 खतरनाक देशों में


खुशबू(ख़ुशी)इन्द्री :
भारत अब सबसे अधिक खतरनाक देशों की श्रेणी में आ गया है। ग्लोबल पीस इंडेक्स (जीपीआइ) 2011 के अनुसार शांतिप्रिय माने जाने वाले इस देश में अशांति तेजी से बढ़ी है। भारत इस बार इस सूची में सात अंक नीचे आ गया है। दरअसल, ग्लोबल पीस इंडेक्स 23 सूचकांकों पर देशों के हालात की विवेचना और आकलन करता है। इसमें सैन्य अभियानों पर खर्च, अपराध की बढ़ती दर, संघर्ष के स्तर और पड़ोसी देशों से उसके संबंध शामिल हैं। इन पैमानों पर आकलन के बाद देश को सात पायदान नीचे उतरना पड़ा है। इस नई रैंकिंग के हिसाब से भारत अब बीस सबसे अधिक खतरनाक देशों में शुमार हो गया है जहां पर अशांति और संघर्ष का बोलबाला है। 
भारत सात अंक गिरकर अब कुल 153 देशों के सूचकांक में 135 नंबर पर आ गया है। इन बीस सबसे खतरनाक देशों में पाकिस्तान (146वां स्थान) और अफगानिस्तान (150वां स्थान) पर है। ग्लोबल पीस इंडेक्स के संस्थापक स्टीव केलीली ने एक साक्षात्कार में बताया कि भारत के अंक अधिकांश मापदंडों पर पहले जैसे ही रहे हैं इसलिए वहां ऐसी कोई विकट स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है। सामूहिक हत्याएं और अपराध की दर भी भारत में अन्य देशों से काफी कम हैं। रैंकिंग में गिरावट की मूल वजह सिर्फ इतनी है कि भारतीय समाज में अपराध बढ़ने की छवि बन गई है। तीन साल की आर्थिक मंदी खत्म होने के तुरंत बाद ही सबसे अधिक शांतिप्रिय देश के रूप में न्यूजीलैंड को हटाकर आइसलैंड ने यह जगह ले ली है। वहीं पिछली बार सबसे अशांत देश घोषित इराक की जगह सोमालिया ने ली है। लगातार तीसरे साल सामाजिक उठापटक विश्व को और अधिक अशांत बना रही है। वहीं आर्थिक तनावों के चलते चीन के लिए खतरा पैदा होने का भी दावा इस इंडेक्स में किया गया है। जीपीआइ के अनुसार आर्थिक कारणों से ही अरब देशों की हलचल के साथ ही विश्व के मध्य भूभाग में अशांति है। खाद्य पदार्थो की कीमतें आसमान छूने के चलते ही मिस्र, ट्यूनीशिया और अन्य देशों में संघर्ष शुरू हो गया है। कुछ देशों में खूनखराबा हदें पार कर चुका है। हालांकि इस परेशानी का मुकाबला यूरोपीय देशों में सड़कों पर आवाज बुलंद करके हो रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। जिसमें बताया गया है कि आइवरी कोस्ट, लीबिया और उत्तर-दक्षिण कोरिया के बीच सीमा विवाद जारी रहने के बावजूद वहां युद्ध के हालात अब खत्म हो चुके हैं। यह पड़ोसी देश अब तनावपूर्ण शांति से काम ले रहे हैं। कभी बड़े दुश्मन पड़ोसी देश अब सह-अस्तित्व की भावना को समझते हुए मिल-जुलकर रह रहे हैं। केलीली ने कहा कि सबसे रोचक और अहम अध्ययन चीन का है। वहां आने वाले समय में बड़े बदलाव तय हैं। अगर आने वाले सालों में वहां आर्थिक विकास की गति मंद पड़ती गई तो हिंसक प्रतिक्रिया और अस्थिरता संभव है। उन्होंने बताया कि शांति को सुनिश्चित करने के लिए सबसे अहम आयाम सुचारू रूप से चलने वाली सरकारें, अपेक्षाकृत एकरूप समाज, संपत्ति की समान भागीदारी, कालेज स्तर तक अच्छी शिक्षा, प्रेस की 
आजादी हैं।

जनसंख्या बढ़ोतरी, कहीं बहुत कम कहीं बहुत ज्यादा

खुशबू(इन्द्री)करनाल :

हर सेकंड औसतन 2.6 बच्चे पैदा होते हैं, हर मिनट 158, हर दिन 2 लाख 28 हजार 155 लोग दुनिया में पैदा होते हैं। हर सेंकड दुनिया की जनसंख्या बढ़ रही है। कुल 6 अरब 96 करोड़ से ज्यादा लोग हैं। और हर टिक टिक के साथ बढ़ रहे हैं। 
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक 2100 में दुनिया की जनसंख्या दस अरब हो जाएगी। 1950 से अब तक दुनिया की जनसंख्या का बढ़ना आधा हो गया है। मतलब पहले हर महिला के औसतन पांच बच्चे होते थे, लेकिन अब यह संख्या आधी हो गई है। इसका मुख्य कारण परिवार नियोजन है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग के अध्यक्ष थोमास बुइटनर कहते हैं, 'जो जनसंख्या आज हम देख रहे हैं वह सुधार भरे कदम का परिणाम है। अगर 1950 के कदम नहीं बदले होते तो आज जनसंख्या के आंकड़े अलग होते।'

हालांकि तस्वीर का सिर्फ एक यही अच्छा पहलू होता तो बहुत ही बढ़िया था, लेकिन ऐसा है नहीं। क्योंकि अमीर देशों में जनसंख्या घट रही है और गरीब देशों में लगातार बढ़ रही है। जनसंख्या के बढ़ने की गति अगर इसी तेजी से जारी रही तो इस सदी के आखिर में ही धरती पर 27 अरब लोग हो जाएंगे। अभी से चार गुना ज्यादा। लेकिन नाइजीरिया में थ्योरिटिकली दो अरब ज्यादा होंगे तो जर्मनी की जनसंख्या आधी हो जाएगी और चीन में 50 करोड़ लोग कम हो जाएंगे।

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ एक और मामले पर नजर डालते हैं, 'ज्यादा से ज्यादा लोगों को परिवार नियोजन की सुविधा मिल रही रही और मत्यु दर कम हो गई है। विकास के सभी काम, परिवार नियोजन की कोशिशें मां और बच्चों के मरने की दर कम करती है।' 

इन आंकड़ों के मुताबिक गरीब से गरीब देशों में भी प्रति महिला बच्चों की संख्या कम हो जाएगी। और इसलिए 2100 तक दुनिया में करीब दस अरब लोगों के धरती पर रहने का अनुमान संयुक्त राष्ट्र ने लगाया है।

असमान जनसंख्या बढ़ोतरी : -

यूएन ने अनुमान लगाया है कि अगर प्रति महिला औसतन एक दशमलव छह बच्चे पैदा होते हैं तो जनसंख्या 16 अरब तक पहुंच जाएगी। यह सबसे ज्यादा वाला अनुमान है और एकदम कम होने की स्थिति में दुनिया की जनसंख्या घट कर छह अरब ही रह जाएगी जो आज की संख्या से भी कम होगी। दो हजार आठ में भी संयुक्त राष्ट्र ने इसी तरह का अनुमान लगाया था जिसे उसे ठीक करना पड़ा था।


जर्मन जनसंख्या संस्था (वेल्ट बेफ्योल्करुंग प्रतिष्ठान) की प्रमुख रेनाटे बैहर बताती हैं, 'दो हजार पचास में बीस करोड़ जनसंख्या बढ़ने के सुधार को इसलिए करना पड़ा क्योंकि पैदा होने वाले बच्चों की संख्या जितना कम होने का अनुमान था वैसा आखिरी दो साल में हुआ नहीं। यह एक चेतावनी है। उम्मीद करते हैं कि नेता इस चेतावनी को सुनेंगे और इस पर कार्रवाई करेंगे।'
इसके लिए रेनाटे बैहर थाईलैंड और केन्या का उदाहरण देती हैं, 'आप अगर आज केन्या और थाईलैंड की ओर देखें तो पता चलेगा कि दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। केन्या में जनसंख्या चार गुना बढ़ी है जबकि थाईलैंड में सिर्फ दो गुना।'
इसका कारण सिर्फ एक ही है कि 1970 के दशक में थाईलैंड ने दो बच्चे प्रति परिवार की नीति अपनाई और इसे आगे बढ़ाया। अब तो केन्या भी इसे समझ गया है कि परिवार की खुशहाली कम बच्चे ही जरूरी हैं, लेकिन दुनिया के कई देश अभी भी नहीं समझे हैं।

Dr.Anshu Kataria (35) Elected as President of 40 years old Chandigarh Management Association (CMA)


Chandigarh :Sanjay Pahwa:
 History has been created today in Chandigarh Management Association (CMA). Dr.Anshu Kataria, Chairman, Aryans Group of Colleges has been selected as President of CMA. This is first time in 40 years history of CMA that a 35 years old young leader has been chosen for such a prestigious post. Dr.Kataria is Doctorate from University Business School, Panjab University, Chandigarh and is running Aryans Group of Colleges on Chandigarh-Patiala Highway, near Chandigarh.
 The winning team includes Dr.Manoj K.Sharma (Vice-President), Mr.M.L.Garg (Joint Secretary), Ms.Madhulika Kak (General Secretary) and Mr.A.K.Verma (Treasurer). The other Executive members are Mr.Amarjit Singh Tanda, Mr.Arun Kumar Gandhi, Mr.Balwant Gurunay, Dr.Niraj Pasricha, Dr.T.L.Kaushal, Mr.J.N.Vohra, Mr.Jagtaran Singh Nayyar and CA Mr.Vivek Goyal.Dr Zora Singh (Desh Bhagat), Dr.Aneet (Gian Jyoti) & Gurvinder Singh Bahra (Rayat & Bahra) were also elected as Organizational member.
Addressing the CMA, Dr.Kataria said that with the cooperation of other members, he would make CMA as the best among India’s Management Associations. He further said that he would work for widening the membership base of CMA and also to make it financially strong. Before that, Annual general Meeting of CMA took place where Dr.Gulshan Sharma (President, CMA) & Sh.J.N.Vohra (Genera l Secretary) addressed the members of CMA.
Established in 1966, CMA is a registered society affiliated to the All India Management Association (AIMA). Aimed at promoting professional management concepts amongst management fraternity representing Industry, Trade and Academia of the Chandigarh and its adjoining satellite cities the association has more than 400 members.
Young and enterprising Kataria has achieved several milestones in his short career of over a decade where he is running a successful Business School. He also plans to expand his horizon by making a foray into engineering and nursing colleges from the current academic session. His vision to make a difference in the field by equating quality and excellence with performance has helped Aryans Business School being considered among the reputed business schools of the region.

कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ जागरूकता

नई दिल्ली। (प्रेमबाबू शर्मा) : 
बाहरी दिल्ली स्थित शकूरपुर जेजे कालोनी में लोगों को कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफं जागरुक करने के मकसद संे एक कार्यक्रम का आयोजन हु। कार्यक्रम का आयोजन सामाजिक संस्था जनजागृति वेलफेयर सोसायटी सिरसपुर और एनएसयूआई नेता दीपिका देसवाल ने मिलकर किया।इस मौके फैशन डिजाइनर संजना जॉन,गोल्ड मेडलिस्ट पहलवान अनिल खत्री, पदमश्री डा. मौसिम अली,प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव विजेंद्र जिंदल, संस्था के उपाध्यक्ष नरेश देसवाल, पास्टर इमैनुअल, सुशांत मिश्रा, परवीन रज्जी, सुषमा ढींगरा, जेबी जैन, प्रेम, पंजाब से कांग्रेस नेता परविंदर कौर समेत कई गणमान्य लोग मौजूद थे। इस मौके पर एक जागरुकता रैली का आयोजन भी हुआ, जिसमें लड़कियों की घटती तादाद पर चिंता जताते हुए कन्या भ्रूण हत्या रोकने का संदेश दिया गया। अगर बेटी को कोख में ही मार डालोगे, तो बेटे के लिए बहू कहां से लाओगे। कार्यक्रम में जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क और राजधानी संदेश समाचार पत्र ने मीडिया पार्टनर की भूमिका अदा की। 
दीपिका देसवाल और संजना जॉन इस मौके पर कहा कि भारत वर्ष को हमेशा महिलाओ की पूजा के लिए जाना जाता है। नारी को जननी कहा जाता है। उसी नारी को कमजोर करने की जो साजिश कन्या भ्रूण हत्या के रुप की जा रही है। उसे रोकने के लिए जागरुकता की जरुरत है। पीएनडीटी एक्ट 1994 का हवाला देते हुए भी बताया कि भ्रूण जांच के लिए अल्ट्रासाउंड अथवा कोई भी तरीका अपनाने वालो को तीन साल की सजा और 10 हजार रुपये जुर्माना और दूसरी बार दोषी पाए जाने पर पांच साल की सजा और 50 हजार से एक लाख रुपये तक जुर्माना होने का प्रावधान है। साथ ही उस मेडिकल अथोर्टी का लाइसेंस तक रद्द किए जाने का प्रावधान है। इसके लिए लिंगानुपात में महिलाओं की संख्या बढाए जाने की जरुरत है। सरकार ने महिलाओं के लिए शिक्षा से लेकर रोजगार तक के लिए कई सुविधाएं दी है, जिनमें सबला, लाडली और ऐसी ही कई योजनाएं चल रही हैं। जिसका फायदा भी महिलाओं को उठाना चाहिए। अंत में सभी ने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने का संकल्प लिया। सोसायटी के अध्यक्ष नरेशपाल राणा ने आए हुए सभी अतिथियों का आभार जताया।

Tuesday, June 7, 2011

पान मसाला बताकर हो रहा गुटखे का विज्ञापन

खुशबू(ख़ुशी)इन्द्री :
मुंबई सहित देश भर में तंबाकू उत्पाद निषेध अधिनियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। महानगर में पान मसाला विज्ञापन के रूप में तम्बाकू उत्पादों का धड़ल्ले से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। संगठन ने मुम्बई महानगर के तीन हजार लोगों के बीच यह सर्वेक्षण किया था। इसमें अधिकतर उत्तरदाताओं ने पान मसाला विज्ञापन को गुटखा का प्रचार बताया है। ऐसी स्थिति में यह सिगरेट व अन्य तंबाकू उत्पाद (उत्पादन, आपूर्ति, वितरण, व्यापार एवं वाणिज्य के विनियमन और विज्ञापन का निषेध) अधिनियम-2003 का उल्लंघन करता है। सर्वेक्षण के लिए दो समूहों का चयन किया गया था। एक समूह ने 12-18 वर्ष के आयु वर्ग (बच्चे) की प्रतिक्रिया ली और दूसरे समूह ने 19-50 वर्ष के आयुवर्ग (युवा) की। सर्वेक्षणकर्ताओं ने उत्तरदाताओं को तीन ब्रांडों वाले पान मसाला विज्ञापनों के फ्लैश कार्ड दिखाए जो होर्डिग और बेस्ट बसों पर दिखाई देते हैं। पहले फ्लैश कार्ड के उत्तरदाताओं में 82 फीसदी (1235) बच्चों और 84 फीसदी (1255) युवाओं ने इसे गुटखा बताया, जबकि 9 फीसदी (136) बच्चों और 7 फीसदी (105) युवाओं ने कहा कि यह पान मसाला है। दूसरे फ्लैश कार्ड के उत्तरदाताओं में 62 फीसदी बच्चों और 71 फीसदी युवाओं ने इसे गुटखा बताया, जबकि 14 फीसदी बच्चों और 13 फीसदी युवाओं ने इसे पान मसाला करार दिया। इसी प्रकार तीसरे फ्लैश कार्ड के उत्तरदाताओं में 58 फीसदी बच्चों और 65 फीसदी युवाओं ने इसे गुटखा कहा, जबकि 17 फीसदी बच्चों और 15 फीसदी युवाओं ने इसे पान मसाला बताया। सलाम बॉम्बे की कार्यक्रम निदेशक देविका चड्ढा ने कहा, सभी तीन ब्रांडों ने पान मसाला उत्पाद का विज्ञापन करने का दावा किया है। जबकि अध्ययन में सामने आया है कि विज्ञापन अप्रत्यक्ष रूप से उनके गुटखा का प्रचार-प्रसार करते हैं क्योंकि विज्ञापन देखने वालों ने इसे गुटखा का प्रचार बताया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विज्ञापन उत्पादों को खरीदने में उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। संगठन ने भारतीय विज्ञापन परिषद (एसीआइ) को पत्र लिखकर ऐसे ब्रांडों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है जो अप्रत्यक्ष रूप से तंबाकू उत्पादों का प्रचार-प्रसार कर उत्पाद निषेध अधिनियम का उल्लंघन करते हैं।


Monday, June 6, 2011

देश के धनी भी नहीं चाहते घर की लक्ष्मी


खुशबू(ख़ुशी)इन्द्री :
एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि संतान के रूप में एक कन्या होने के बाद यदि गर्भ में दूसरी भी लड़की आ जाती है तो ऐसे भ्रूण की हत्या करवाने की प्रवृत्ति भारत में धनी एवं शिक्षित तबकों में तेजी से बढ़ रही है। प्रतिष्ठित लैंसेट पत्रिका के आगामी अंक में छपने वाले इस अध्ययन के निष्कर्षो के अनुसार 1980 से 2010 के बीच इस तरह के गर्भपातों की संख्या 42 लाख से एक करोड़ 21 लाख के बीच रही है। अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले कुछ दशकों में पुत्र की चाहत में चुनिंदा गर्भपात का चलन बढ़ा है। साथ ही लड़के-लड़कियों के अनुपात में कमी की प्रवृत्ति जो अभी तक उत्तरी राज्यों में ही ज्यादा पाई जाती थी अब उसका प्रकोप पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में भी फैलने लगा है। टोरंटो विश्वविद्यालय के प्रभात झा इस अध्ययन पत्र के मुख्य लेखक हैं। उन्होंने बताया, भारत की अधिकतर आबादी ऐसे राज्यों में रहती है जहां इस तरह के मामले आम हैं। अध्ययन में जनगणना आंकड़ों और राष्ट्रीय सर्वेक्षण के जन्म आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस विश्लेषण का मकसद ऐसे परिवारों में दूसरे बच्चे के जन्म में बालक-बालिका के अनुपात का अंदाजा लगाया जा सका जहां पहली संतान के रूप में बच्ची पैदा हो चुकी थी। अध्ययन में पाया गया कि 1990 में प्रति 1000 लड़कों पर 906 लड़कियां थीं जो 2005 में घटकर 836 रह गई। झा ने कहा कि अनुपात में यह गिरावट उन परिवारों में अधिक देखी गई जहां जन्म देने वाली मां ने दसवीं या उससे उच्च कक्षा की शिक्षा हासिल कर रखी थी और जो संपन्न गृहस्थी की थी। लेकिन ऐसे ही परिवारों में यदि पहला बच्चा लड़का है तो दूसरी संतान के मामले में लड़का-लड़की अनुपात में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने कहा कि इससे यह सुझाव मिलता है कि कन्या भ्रूण का चुनिंदा गर्भपात शिक्षित एवं संपन्न परिवारों में ज्यादा मिलता है। ऐसी प्रवृत्ति आम तौर पर पहली संतान के लड़की होने के मामलों में देखी जाती है। 1980 के दशक में कन्या भ्रूण का चुनिंदा गर्भपात 0.20 लाख था, जो 1990 के दशक में बढ़कर 12 लाख से 40 लाख तथा 2000 के दशक में 31 लाख से 60 लाख तक हो गया।
अमेरिका में भी भारतीय मूल की महिलाएं आगे : भारत ही नहीं अमेरिका में भी भारतीय मूल की महिलाएं पुत्र की चाह में खूब कन्या भू्रण हत्या करवा रही हैं। खास बात यह है कि भारत के विपरीत अमेरिका में लिंग निर्धारण करवाना कानूनन वैध है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने सितंबर 2004 से दिसंबर 2009 के बीच लिंग निर्धारण परीक्षण करवाने वाली कैलिफोर्निया, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क की प्रवासी भारतीय महिलाओं का साक्षात्कार किया। शोध में यह बात सामने आई कि 40 प्रतिशत महिलाओं ने यह जानने के बाद कि उनके गर्भ में कन्या पल रही है, गर्भपात करवा दिया। साक्षात्कार के दौरान जो महिलाएं गर्भवती थीं, उनमें से 89 प्रतिशत ने कन्या भू्रण हत्या करवाई। शोध में यह बात सामने आई कि जिन महिलाओं ने यह जानने के बावजूद उसे जन्म दिया कि उनके पेट में कन्या भ्रूण है, उन्हें गर्भावस्था के दौरान कई तरह के मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से गुजरना पड़ा|

भारत 20 खतरनाक देशों में


खुशबू(ख़ुशी)इन्द्री :
भारत अब सबसे अधिक खतरनाक देशों की श्रेणी में आ गया है। ग्लोबल पीस इंडेक्स (जीपीआइ) 2011 के अनुसार शांतिप्रिय माने जाने वाले इस देश में अशांति तेजी से बढ़ी है। भारत इस बार इस सूची में सात अंक नीचे आ गया है। दरअसल, ग्लोबल पीस इंडेक्स 23 सूचकांकों पर देशों के हालात की विवेचना और आकलन करता है। इसमें सैन्य अभियानों पर खर्च, अपराध की बढ़ती दर, संघर्ष के स्तर और पड़ोसी देशों से उसके संबंध शामिल हैं। इन पैमानों पर आकलन के बाद देश को सात पायदान नीचे उतरना पड़ा है। इस नई रैंकिंग के हिसाब से भारत अब बीस सबसे अधिक खतरनाक देशों में शुमार हो गया है जहां पर अशांति और संघर्ष का बोलबाला है। 
भारत सात अंक गिरकर अब कुल 153 देशों के सूचकांक में 135 नंबर पर आ गया है। इन बीस सबसे खतरनाक देशों में पाकिस्तान (146वां स्थान) और अफगानिस्तान (150वां स्थान) पर है। ग्लोबल पीस इंडेक्स के संस्थापक स्टीव केलीली ने एक साक्षात्कार में बताया कि भारत के अंक अधिकांश मापदंडों पर पहले जैसे ही रहे हैं इसलिए वहां ऐसी कोई विकट स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है। सामूहिक हत्याएं और अपराध की दर भी भारत में अन्य देशों से काफी कम हैं। रैंकिंग में गिरावट की मूल वजह सिर्फ इतनी है कि भारतीय समाज में अपराध बढ़ने की छवि बन गई है। तीन साल की आर्थिक मंदी खत्म होने के तुरंत बाद ही सबसे अधिक शांतिप्रिय देश के रूप में न्यूजीलैंड को हटाकर आइसलैंड ने यह जगह ले ली है। वहीं पिछली बार सबसे अशांत देश घोषित इराक की जगह सोमालिया ने ली है। लगातार तीसरे साल सामाजिक उठापटक विश्व को और अधिक अशांत बना रही है। वहीं आर्थिक तनावों के चलते चीन के लिए खतरा पैदा होने का भी दावा इस इंडेक्स में किया गया है। जीपीआइ के अनुसार आर्थिक कारणों से ही अरब देशों की हलचल के साथ ही विश्व के मध्य भूभाग में अशांति है। खाद्य पदार्थो की कीमतें आसमान छूने के चलते ही मिस्र, ट्यूनीशिया और अन्य देशों में संघर्ष शुरू हो गया है। कुछ देशों में खूनखराबा हदें पार कर चुका है। हालांकि इस परेशानी का मुकाबला यूरोपीय देशों में सड़कों पर आवाज बुलंद करके हो रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। जिसमें बताया गया है कि आइवरी कोस्ट, लीबिया और उत्तर-दक्षिण कोरिया के बीच सीमा विवाद जारी रहने के बावजूद वहां युद्ध के हालात अब खत्म हो चुके हैं। यह पड़ोसी देश अब तनावपूर्ण शांति से काम ले रहे हैं। कभी बड़े दुश्मन पड़ोसी देश अब सह-अस्तित्व की भावना को समझते हुए मिल-जुलकर रह रहे हैं। केलीली ने कहा कि सबसे रोचक और अहम अध्ययन चीन का है। वहां आने वाले समय में बड़े बदलाव तय हैं। अगर आने वाले सालों में वहां आर्थिक विकास की गति मंद पड़ती गई तो हिंसक प्रतिक्रिया और अस्थिरता संभव है। उन्होंने बताया कि शांति को सुनिश्चित करने के लिए सबसे अहम आयाम सुचारू रूप से चलने वाली सरकारें, अपेक्षाकृत एकरूप समाज, संपत्ति की समान भागीदारी, कालेज स्तर तक अच्छी शिक्षा, प्रेस की 
आजादी हैं।

जनसंख्या बढ़ोतरी, कहीं बहुत कम कहीं बहुत ज्यादा

खुशबू(इन्द्री)करनाल :

हर सेकंड औसतन 2.6 बच्चे पैदा होते हैं, हर मिनट 158, हर दिन 2 लाख 28 हजार 155 लोग दुनिया में पैदा होते हैं। हर सेंकड दुनिया की जनसंख्या बढ़ रही है। कुल 6 अरब 96 करोड़ से ज्यादा लोग हैं। और हर टिक टिक के साथ बढ़ रहे हैं। 
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक 2100 में दुनिया की जनसंख्या दस अरब हो जाएगी। 1950 से अब तक दुनिया की जनसंख्या का बढ़ना आधा हो गया है। मतलब पहले हर महिला के औसतन पांच बच्चे होते थे, लेकिन अब यह संख्या आधी हो गई है। इसका मुख्य कारण परिवार नियोजन है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग के अध्यक्ष थोमास बुइटनर कहते हैं, 'जो जनसंख्या आज हम देख रहे हैं वह सुधार भरे कदम का परिणाम है। अगर 1950 के कदम नहीं बदले होते तो आज जनसंख्या के आंकड़े अलग होते।'

हालांकि तस्वीर का सिर्फ एक यही अच्छा पहलू होता तो बहुत ही बढ़िया था, लेकिन ऐसा है नहीं। क्योंकि अमीर देशों में जनसंख्या घट रही है और गरीब देशों में लगातार बढ़ रही है। जनसंख्या के बढ़ने की गति अगर इसी तेजी से जारी रही तो इस सदी के आखिर में ही धरती पर 27 अरब लोग हो जाएंगे। अभी से चार गुना ज्यादा। लेकिन नाइजीरिया में थ्योरिटिकली दो अरब ज्यादा होंगे तो जर्मनी की जनसंख्या आधी हो जाएगी और चीन में 50 करोड़ लोग कम हो जाएंगे।

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ एक और मामले पर नजर डालते हैं, 'ज्यादा से ज्यादा लोगों को परिवार नियोजन की सुविधा मिल रही रही और मत्यु दर कम हो गई है। विकास के सभी काम, परिवार नियोजन की कोशिशें मां और बच्चों के मरने की दर कम करती है।' 

इन आंकड़ों के मुताबिक गरीब से गरीब देशों में भी प्रति महिला बच्चों की संख्या कम हो जाएगी। और इसलिए 2100 तक दुनिया में करीब दस अरब लोगों के धरती पर रहने का अनुमान संयुक्त राष्ट्र ने लगाया है।

असमान जनसंख्या बढ़ोतरी : -

यूएन ने अनुमान लगाया है कि अगर प्रति महिला औसतन एक दशमलव छह बच्चे पैदा होते हैं तो जनसंख्या 16 अरब तक पहुंच जाएगी। यह सबसे ज्यादा वाला अनुमान है और एकदम कम होने की स्थिति में दुनिया की जनसंख्या घट कर छह अरब ही रह जाएगी जो आज की संख्या से भी कम होगी। दो हजार आठ में भी संयुक्त राष्ट्र ने इसी तरह का अनुमान लगाया था जिसे उसे ठीक करना पड़ा था।


जर्मन जनसंख्या संस्था (वेल्ट बेफ्योल्करुंग प्रतिष्ठान) की प्रमुख रेनाटे बैहर बताती हैं, 'दो हजार पचास में बीस करोड़ जनसंख्या बढ़ने के सुधार को इसलिए करना पड़ा क्योंकि पैदा होने वाले बच्चों की संख्या जितना कम होने का अनुमान था वैसा आखिरी दो साल में हुआ नहीं। यह एक चेतावनी है। उम्मीद करते हैं कि नेता इस चेतावनी को सुनेंगे और इस पर कार्रवाई करेंगे।'
इसके लिए रेनाटे बैहर थाईलैंड और केन्या का उदाहरण देती हैं, 'आप अगर आज केन्या और थाईलैंड की ओर देखें तो पता चलेगा कि दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। केन्या में जनसंख्या चार गुना बढ़ी है जबकि थाईलैंड में सिर्फ दो गुना।'
इसका कारण सिर्फ एक ही है कि 1970 के दशक में थाईलैंड ने दो बच्चे प्रति परिवार की नीति अपनाई और इसे आगे बढ़ाया। अब तो केन्या भी इसे समझ गया है कि परिवार की खुशहाली कम बच्चे ही जरूरी हैं, लेकिन दुनिया के कई देश अभी भी नहीं समझे हैं।

Dr.Anshu Kataria (35) Elected as President of 40 years old Chandigarh Management Association (CMA)


Chandigarh :Sanjay Pahwa:
 History has been created today in Chandigarh Management Association (CMA). Dr.Anshu Kataria, Chairman, Aryans Group of Colleges has been selected as President of CMA. This is first time in 40 years history of CMA that a 35 years old young leader has been chosen for such a prestigious post. Dr.Kataria is Doctorate from University Business School, Panjab University, Chandigarh and is running Aryans Group of Colleges on Chandigarh-Patiala Highway, near Chandigarh.
 The winning team includes Dr.Manoj K.Sharma (Vice-President), Mr.M.L.Garg (Joint Secretary), Ms.Madhulika Kak (General Secretary) and Mr.A.K.Verma (Treasurer). The other Executive members are Mr.Amarjit Singh Tanda, Mr.Arun Kumar Gandhi, Mr.Balwant Gurunay, Dr.Niraj Pasricha, Dr.T.L.Kaushal, Mr.J.N.Vohra, Mr.Jagtaran Singh Nayyar and CA Mr.Vivek Goyal.Dr Zora Singh (Desh Bhagat), Dr.Aneet (Gian Jyoti) & Gurvinder Singh Bahra (Rayat & Bahra) were also elected as Organizational member.
Addressing the CMA, Dr.Kataria said that with the cooperation of other members, he would make CMA as the best among India’s Management Associations. He further said that he would work for widening the membership base of CMA and also to make it financially strong. Before that, Annual general Meeting of CMA took place where Dr.Gulshan Sharma (President, CMA) & Sh.J.N.Vohra (Genera l Secretary) addressed the members of CMA.
Established in 1966, CMA is a registered society affiliated to the All India Management Association (AIMA). Aimed at promoting professional management concepts amongst management fraternity representing Industry, Trade and Academia of the Chandigarh and its adjoining satellite cities the association has more than 400 members.
Young and enterprising Kataria has achieved several milestones in his short career of over a decade where he is running a successful Business School. He also plans to expand his horizon by making a foray into engineering and nursing colleges from the current academic session. His vision to make a difference in the field by equating quality and excellence with performance has helped Aryans Business School being considered among the reputed business schools of the region.

कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ जागरूकता

नई दिल्ली। (प्रेमबाबू शर्मा) : 
बाहरी दिल्ली स्थित शकूरपुर जेजे कालोनी में लोगों को कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफं जागरुक करने के मकसद संे एक कार्यक्रम का आयोजन हु। कार्यक्रम का आयोजन सामाजिक संस्था जनजागृति वेलफेयर सोसायटी सिरसपुर और एनएसयूआई नेता दीपिका देसवाल ने मिलकर किया।इस मौके फैशन डिजाइनर संजना जॉन,गोल्ड मेडलिस्ट पहलवान अनिल खत्री, पदमश्री डा. मौसिम अली,प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव विजेंद्र जिंदल, संस्था के उपाध्यक्ष नरेश देसवाल, पास्टर इमैनुअल, सुशांत मिश्रा, परवीन रज्जी, सुषमा ढींगरा, जेबी जैन, प्रेम, पंजाब से कांग्रेस नेता परविंदर कौर समेत कई गणमान्य लोग मौजूद थे। इस मौके पर एक जागरुकता रैली का आयोजन भी हुआ, जिसमें लड़कियों की घटती तादाद पर चिंता जताते हुए कन्या भ्रूण हत्या रोकने का संदेश दिया गया। अगर बेटी को कोख में ही मार डालोगे, तो बेटे के लिए बहू कहां से लाओगे। कार्यक्रम में जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क और राजधानी संदेश समाचार पत्र ने मीडिया पार्टनर की भूमिका अदा की। 
दीपिका देसवाल और संजना जॉन इस मौके पर कहा कि भारत वर्ष को हमेशा महिलाओ की पूजा के लिए जाना जाता है। नारी को जननी कहा जाता है। उसी नारी को कमजोर करने की जो साजिश कन्या भ्रूण हत्या के रुप की जा रही है। उसे रोकने के लिए जागरुकता की जरुरत है। पीएनडीटी एक्ट 1994 का हवाला देते हुए भी बताया कि भ्रूण जांच के लिए अल्ट्रासाउंड अथवा कोई भी तरीका अपनाने वालो को तीन साल की सजा और 10 हजार रुपये जुर्माना और दूसरी बार दोषी पाए जाने पर पांच साल की सजा और 50 हजार से एक लाख रुपये तक जुर्माना होने का प्रावधान है। साथ ही उस मेडिकल अथोर्टी का लाइसेंस तक रद्द किए जाने का प्रावधान है। इसके लिए लिंगानुपात में महिलाओं की संख्या बढाए जाने की जरुरत है। सरकार ने महिलाओं के लिए शिक्षा से लेकर रोजगार तक के लिए कई सुविधाएं दी है, जिनमें सबला, लाडली और ऐसी ही कई योजनाएं चल रही हैं। जिसका फायदा भी महिलाओं को उठाना चाहिए। अंत में सभी ने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने का संकल्प लिया। सोसायटी के अध्यक्ष नरेशपाल राणा ने आए हुए सभी अतिथियों का आभार जताया।